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Showing posts from April, 2020

Former PM Chandra Shekhar The last Icon Of Ideological Politics

यादों को एक बहाना चाहिए। सियासत को शायद वो भी नहीं चाहिए। पर हम नेता नहीं हैं। साफ कहना चाहिए। एक जुलाई के दिन चंद्रशेखर पैदा हुए थे। पूर्व प्रधानमंत्री बलिया के बाबू साहब। जो कभी न तो राज्य में मंत्री रहे और न ही केंद्र में। बने तो सीधे प्रधानमंत्री। आज उनके कुछ किस्से सुनाता हूं आपको। 1951 में सोशलिस्ट पार्टी के फुल टाइम वर्कर बन गए युवा चंद्रशेखर। तीखे तेवर थे। बात खुलकर कहते थे। जाहिर है कि ज्यादातर लोगों से पटती नहीं थी।  इन लोगों में सोशलिस्ट पार्टी के लंबरदार राम मनोहर लोहिया भी थे। एक बार चंद्रशेखर आचार्य नरेंद्र देव को आमंत्रित करने इलाहाबाद गए। आचार्य बीमार थे। वहीं लोहिया मौजूद थे। उन्होंने कहा: आप डॉक्टर लोहिया को ले जाइए। लोहिया बोले , मुझे तो कलकत्ता जाना है। चंद्रशेखर ने कहा,बलिया से चले जाइएगा। बक्सर से ट्रेन है। वहां तक आपको जीप से भिजवा दूंगा। लोहिया बलिया पहुंचे। स्टेशन पर ही पूछने लगे,  जीप कहां हैं। चंद्रशेखर ने कहा , इंतजाम हो चुका है। गेस्ट हाउस पहुंचे तो लोहिया ने फिर सवाल दोहराया।  चंद्रशेखर ने कहा , शाम तक आ जाएगी। आपको तो वैसे भी कल स...

डॉ लोहिया भारतीय राजनीति के अंतिम चिंतक

अगर आज लोहिया होते तो शायद सबसे पहले इस छद्म राष्ट्रवाद के बारे में बोलते की ये की राष्ट्रवाद और हिन्दू धर्म की बात करने वाले लोगों को ना तो हिन्दू धर्म पता है न इन्हें भारत का इतिहास पता है और न ही ये भारतीय राष्ट्रवाद के जनक हो सकते हैं। आज अगर कभी का बार डॉ राममनोहर लोहिया का नाम आता है तो समाजवादी पार्टी के संदर्भ में आता है तो हम सोचते हैं कि जो अखिलेश यादव मुलायम सिंह यादव इनकी पार्टी के पितामह रहे होंगे कुछ ऐसे आदमी होंगे पर डॉ लोहिया का आज की अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी से उतना ही संबंध है जितना कि महात्मा गांधी का राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी से। आज की समाजवादी पार्टी लोहिया के समाजवाद से उतना ही दूर है जितना कि महात्मा गांधी के विचारों से आज की कांग्रेस। अगर आज लोहिया होते तो शायद सबसे पहले बात करते इस देश की बढ़ती हुई आर्थिक ग़ैर बराबरी की। आर्थिक ग़ैर बराबरी से चिढ़ और समता स्थापित करने की ज़िद्द लोहिया ने जिंदगी बार पाली। अगर आज लोहिया होते तो अम्बानी अडानी की बात करते, अगर आज लोहिया होते तो किसानों को आत्माहत्या का सवाल संसद में खड़े होके उठाते। अगर आज लोहिया...

Ravan The Orphan of Aryavart

रावण बनना भी कहाँ आसान था  , कहाँ आसान था अपनी बहन के अभिमान और अपने अहंकार के लिए भगवान से टक्कर लेना ! अंहकार में तो देवराज इंद्र तक ने अपनी इंद्रलोक को खोया है परन्तु महान रावण हो गया । पूरे रामायण से सिखे तो स्वंय तो श्रीराम ने विभीषण की मदद ली परन्तु बिना किसी भेद के रावण ने श्रीमन नारायण के अवतार को जान लेने के बाद भी वीरता से युद्ध किया , अस्त्र शस्त्र और प्रचंड मायावी अपितु परम शिव भक्त । श्रीराम ने तो वध कर दिया है रावण का त्रेतायुग में ही परन्तु रावण का अट्टहास अब भी जैसे दिमाग़ में घुम सा रहा है , अगर वो नारायण है तो उनका और मेरा नाम एक साथ लिया जायेगा और ये विश्व कीर्तिमान होगा । रावण अमर है !! शायद ये कथन सत्य था वरना हम आज भी हर साल रावण को जलाते नही , साल दर साल !! अब तो श्रीराम नही दिख रहे परन्तु रावण हर जगह है हमने रावण से परम ज्ञानी होना तो नही सीखा , भक्ति करना नही सीखा , अभिमान और अंहकार में फर्क नही सीखा ,जिंदादिल होकर बहादुरी से टक्कर लेना नही सीखा ,  हां पर झुठे अहंकर को जिंदा रखना सीख लिया , हरण करना सीख लिया , स्त्री अपमान करना सीख लिया , बिना किसी ...