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Showing posts from May, 2020

The Mystery of Subhas Chandra Bose's Death in Plane Crash

भारत की स्वतंत्रता के लिए आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व करने वाले सुभाष चंद्र बोस की मौत एक बनी हुई है। हाल में इस मुद्दे पर फिर राजनीतिक हलकों और बुद्धिजीवियों के बीच तीखी बहस छिड़ रही है। आख़िर 'नेताजी' सुभाष बोस किन परिस्थियां में ग़ायब हुए या फिर उनकी मौत हुई? क्यों कई जाने-माने लोग उनकी मौत की ख़बर पर भरोसा नहीं करते? नेताजी सुभाष बोस से संबंधित इन्ही मुद्दों पर है इस बार की विवेचना। ज़ियाउद्दीन ने इंटेलिजेंस को चकमा दिया अठारह जनवरी, 1941, रात एक बज कर पैंतीस मिनट पर 38/2, एलगिन रोड, कोलकाता पर एक जर्मन वांडरर कार आ कर रुकी। कार का नंबर था BLA 7169। लंबी शेरवानी, ढीली सलवार और सोने की कमानी वाला चश्मा पहने बीमा एजेंट मोहम्मद ज़ियाउद्दीन ने कार का पिछला दरवाज़ा खोला। ड्राइवर की सीट पर उनके भतीजे बैठे हुए थे। उन्होंने जानबूझ कर अपने कमरे की लाइट बंद नहीं की। चंद घंटों में वो गहरी नींद में सोए कोलकाता की सीमा पार कर चंदरनागोर की तरफ़ बढ़ निकले। वहाँ भी उन्होंने अपनी कार नहीं रोकी। वो धनबाद के पास गोमो स्टेशन पर रुके। उनींदी आँखों वाले एक कुली ने ज़ियाउद्दीन का सामान...

Was Indira Gandhi most powerful Prime Minister of India?

सागरिका घोष की लिखी इंदिरा गांधी की नवीनतम जीवनी का टाइटल उन्हें भारत का सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री बताता है। अगर ऐसा ही है तो जब भी उन्हें सत्ता मिली उसे उन्होंने अपने हाथ से जाने क्यों दिया? मुझे लगता है कि उनकी ग़लती ये थी कि वो इस बात को नहीं समझ सकी थीं कि सत्ता हासिल करना एक बात है इसकी ताक़त का इस्तेमाल करना दूसरी बात। और ताक़त हासिल करने की चाहत उन्होंने संस्थाओं को मज़बूत करने की जगह उन्हें कमज़ोर बना दिया। अगर वो ऐसा करतीं तो सत्ता का प्रभावी इस्तेमाल करने में उन्हें काफ़ी मदद मिलती। उनकी एक और कमज़ोरी ये थी कि जब कार्रवाई करने की ज़रुरत थी तो उन्होंने कार्रवाई नहीं की और जब हालात ख़राब होने लगे तो अत्यधिक प्रतिक्रिया होने लगी। ये भी अजीब है कि उनके पतन की शुरुआत उसी समय हुई जब वो अपने सत्ता के शीर्ष पर थीं। बांग्लादेश युद्ध में पाकिस्तान को हराने के बाद जब वो सबसे ज़्यादा ताक़तवर थीं तब उन्होंने सत्ता को और केंद्रित करने की कोशिश की। जबकि ज़रुरत इस बात की थी कि वो सत्ता को इस्तेमाल करने की अपनी क्षमता को बढ़ावा देतीं। पार्टी और नौकरशाही, उनके पास दो ऐसे हथ...

Draupadi: A Role Model for Modern Lady

पौराणिक कथाओं के अनुसार सर्वप्रथम शव की उत्पत्ति हुई जिसमें को जीवन न था तत्पश्चात शक्ति (ई) की उत्पत्ति से ही ई और शव मिलकर शिव बने और जीवन का आविर्भाव हुआ। किंतु जब उसी शक्ति से निर्भया और Me Too जैसी घटनाएं सामने आतीं हैं जब हमें शक्ति के तथाकथित सीता रूप को विस्मृत कर देना चाहिए। इसका विकल्प भी हमें पौराणिक ग्रंथ महाभारत के पात्र द्रौपदी के रूप में मिलता। शायद इसी के दृष्टिगत डॉ० राममनोहर लोहिया कह गए थे " आज की भारतीय नारी का आदर्श सीता नहीं द्रौपदी को होना चाहिए ।" याज्ञसेनी द्रौपदी सभी पौराणिक स्त्री पात्रों में सर्वाधिक सशक्त। पाञ्चाल की राजकुमारी जिसका जन्म यज्ञ के फ़ल स्वरूप हुआ। जिसका जन्म उसके पिता के लिए अवांछित था। जिसने अपने बचपन नहीं देखा। जिसके सखा स्वयं वासुदेव कृष्ण थे। पहली ऐसी स्त्री जिसे अपने स्वयंवर में अपनी पसंद ना होने पर एक विजयी प्रतिभागी से विवाह करने से मना कर दिया और अपने पसंद के वर का ही चयन किया। द्रौपदी इस बात का भी प्रमाण है पुरुषों की तरह स्त्रियाँ भी बहुविवाह की अधिकारी हैं। यदि पुरुष 5 विवाह कर सकता है तो स्त्री भी। द्रौपदी ऐस...

Jaun Elia: Most Trending Shyar of Our Generation

वो जो ख़ुद की हुदूद में भी नहीं बंधा। वो दो तारीखों के बीच कैसे महदूद रह सकता है? किसी के जन्मदिन और बरसी पर उसे याद करने की रवायत होती है पर उसके साथ भी क्या यही दस्तूरी रवैया वाजिब होगा जिसने हर सांस रवायत की मुखालफत में जी हो। यही ख़याल था कि जिसने उनकी यौमे-पैदाइश पर लिखने से रोक दिया। कितनी अजीब लगती है ये बात और उससे भी ज्यादा अजीब लगता है किसी के जन्मदिन के बाद उसे याद करना। पर जिसे आप याद कर रहे हैं वो शख्स ही अजीब हो तो इतनी अजीबियत लाज़मी ही है। वो इतने अजीब थे, इतने अजीब थे कि बस, खुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं किया। दुबले पतले शरीर, लम्बे बाल, काला चश्मा और मुसलसल तारी नशे के बीच जूझती हुई उस शख्सियत का नाम ‘एलिया’ है। युवाओं के लिए शायरी का रॉक स्टार, सूफ़ियाना रविश वालों के लिए ‘हज़रत जौन एलिया’, यारों के लिए ‘जानी जौन एलिया’ और बहुतों के लिए एक पहेली। जिसे जितना हल करने पर आओ उतनी ही उलझती जाती है। यही तआरुफ़ है, उस शायर का जिसने खुद को माचिस की तीलियों की तरह खर्च किया। लोगों ने उसकी आह से उठती आग को अदब की रोशनी कहा और वो तीरगी में तमाम होता रहा। बंद कमरों ...

Manto:The Storywriter with Rebellion Thoughts

सआदत हसन मंटो उर्दू भाषा के बेबाक कहानीकार, 11 मई 1912 को जन्मे और 18 जनवरी 1955 को नहीं रहे। आज उनका बर्थडे है। जाने के बाद उन्हें और ज़्यादा चाहा गया, सराहा गया। उन्होंने कहा भी था "ये मुमकिन है कि सआदत हसन मर जाये और मंटो जिंदा रहे।"  उनकी खूबी थी कि अपनी कहानियों से वो सीधे आंखों में देखकर सवाल करते थे। मुद्दा चाहे कोई भी हो - इश्क हो, अमानवीय घटनाएं हों, दुख हों, मुल्कों के झगड़े हो। अपने 42 साल के जीवन में उन्होंने लघु कथा संग्रह, उपन्यास, रेडियो नाटक, रचनाएं और व्यक्तिगत रेखाचित्र प्रकाशित किए। ‘जो चीज जैसी है, उसे वैसी ही पेश क्यों न किया जाए। टाट को रेशम क्यों कहा जाए।’ इन दो आसान लाइनों में ही सआदत हसन मंटो ने अपनी पूरी आइडियोलॉजी समझा दी। ये बात मंटो एक कॉलेज के क्लास रूम में लेक्चर देते हुए कही। मंटो भारत-पाकिस्तान विभाजन से आहत, समाज के दोगलेपन से बौराए हुए, औरतों से होने वाले दोयम दर्जे के बर्ताव से ग्लानि और गुस्से में डूबे हुए वो दास्तानगो थे। जिनकी कलम से निकले हर एक हर्फ ने स्याह पड़ चुकी सच्चाइयों को बेरहमी से बेपरदा किया है। मंटो पर अश्लीलता फ...

K. Kamaraj:The Kingmaker of Indian Politics

कामराज को इतिहास में शास्त्री और इंदिरा को पीएम बनाने के लिए याद किया जाता है। मगर उन्होंने और भी कई काम किए थे, जो बेहद जरूरी थे मसलन, बच्चों के लिए मिड डे मील स्कीम सबसे पहले उन्हीं ने लागू की थी। तमिलनाडु के हर गांव में आजादी के महज 15 साल बाद बिजली भी उन्हीं के चलते पहुंची थी। आज हम उनके कुछ किस्से सुनाते हैं नेहरू जी आपके बाद कौन? आजादी के बाद 1964 तक नेहरू ने बेधड़क देश पर शासन किया। मगर 60 के दशक की शुरुआत में भारतीय राजनीति पर एक बड़ा सवाल साये की तरह मंडराने लगा था, नेहरू के बाद कौन? विदेशियों को लगता था कि नेहरू की मौत के बाद भारत भी पाकिस्तान जैसा हो जाएगा, मिलिट्री कब्जा कर लेगी। वो ये मानने को तैयार ही नहीं थे कि इतना नया लोकतंत्र मैच्योर ढंग से शासन की बागडोर बदल किसी और को दे सकता है। उधर कांग्रेस पार्टी में अपने ढंग की सिर फुटव्वल चल रही थी। सत्ता के कई दावेदार थे। मुंबई प्रोविंस (महाराष्ट्र-गुजरात का सम्मिलित स्वरूप) के सीएम रहे मोरार जी देसाई थे। यूपी के किसान नेता और नेहरू भक्त लाल बहादुर शास्त्री की भी दावेदारी थी। मगर खुद नेहरू किस पर नजर टिका रहे थे?...

APJ Abdul Kalam: Inside Story of His Presidential Election

आज बारी है देश के 11वें राष्ट्रपति जनता के राष्ट्रपति भारत रत्न डॉ० ऐ०पी०जे० अब्दुल कलाम की। राष्ट्रपति का पद ख़ासा राजनैतिक होता है एक जमाना था जब शिक्षाविद या दार्शनिक राष्ट्रपति हुआ करते थे पर वो समय बीते अब दशकों हो गए थे, फिर एक वैज्ञानिक इस पद पर कैसे पहुंच गया। कलाम के नाम का चुनाव ख़ासा नाट्कीय है।  इस नाटक का पहला अंक खेला गया राजधानी दिल्ली में 5 जून 2002 को, जब BJP की उस कमेटी की मीटिंग हुई जिसे तय करना था NDA की तरफ से राष्ट्रपति पद के लिए किसका नाम नामित किया जाएगा, इस मीटिंग में अटल – आडवाणी के अलावा जॉर्ज फर्नांडिस, वेंकैया नायडू और प्रमोद महाजन भी थे। इस मीटिंग में 5 नामों पर चर्चा हुई महाराष्ट्र के गवर्नर पी०सी० एलेग्जेंडर, उस वक़्त के उपराष्ट्रपति कृष्णकांत, कानूनविद् एम०एल० सिंघवी, इसके अलावा 2 नाम और थे पूर्व रक्षामंत्री के०सी० पंत और आख़िरी नाम ऐ०पी०जे० अब्दुल कलाम। कलाम का नाम इस नेताओं की लिस्ट में कैसे आगया इसका किस्सा भी काफ़ी रोचक है। दिल्ली में वैज्ञानिकों की एक कॉन्फ्रेंस चल रही थी जून का पहला सप्ताह और उसके भी शुरुआती पहले 2 दिन, इसमें सरकार की नुमाइ...