Skip to main content

डॉ लोहिया भारतीय राजनीति के अंतिम चिंतक

अगर आज लोहिया होते तो शायद सबसे पहले इस छद्म राष्ट्रवाद के बारे में बोलते की ये की राष्ट्रवाद और हिन्दू धर्म की बात करने वाले लोगों को ना तो हिन्दू धर्म पता है न इन्हें भारत का इतिहास पता है और न ही ये भारतीय राष्ट्रवाद के जनक हो सकते हैं।


आज अगर कभी का बार डॉ राममनोहर लोहिया का नाम आता है तो समाजवादी पार्टी के संदर्भ में आता है तो हम सोचते हैं कि जो अखिलेश यादव मुलायम सिंह यादव इनकी पार्टी के पितामह रहे होंगे कुछ ऐसे आदमी होंगे पर डॉ लोहिया का आज की अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी से उतना ही संबंध है जितना कि महात्मा गांधी का राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी से। आज की समाजवादी पार्टी लोहिया के समाजवाद से उतना ही दूर है जितना कि महात्मा गांधी के विचारों से आज की कांग्रेस।
अगर आज लोहिया होते तो शायद सबसे पहले बात करते इस देश की बढ़ती हुई आर्थिक ग़ैर बराबरी की। आर्थिक ग़ैर बराबरी से चिढ़ और समता स्थापित करने की ज़िद्द लोहिया ने जिंदगी बार पाली। अगर आज लोहिया होते तो अम्बानी अडानी की बात करते, अगर आज लोहिया होते तो किसानों को आत्माहत्या का सवाल संसद में खड़े होके उठाते। अगर आज लोहिया होते हो सवाल उठाते इस देश मे एक सरकारी कर्मचारी को जिनती न्यूनतम आय मिलती है ₹18-20 हज़ार वो इस देश के किसान को क्यों नहीं मिलनी चाहिये। और इस देश का प्रधानमंत्री व्यतिगत रूप से खुद पर कितना खर्च कर सकता इस पर बहस शुरू की। उस समय RTI का ज़माना नहीं था लोहिया ने आंकड़े निकलवाये और संसद में शायद आज तक के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री पं नेहरू से पूछा इस देश प्रधानमंत्री रोज़ अपने ऊपर 25 हज़ार रुपये ख़र्च कर सकता है और एक आम आदमी 4 आने(25 पैसा) ये है आर्थिक गैर बराबरी। लोहिया ने इस पर बहस चलाई की इस देश में अधिकतम आय कितनी हो सकती है। देश के सबसे अमीर और सबसे गरीब से 1 से 10 का तो अनुपात हो सकता है यानी सबसे अमीर के पास ₹10 तो सबसे गरीब के पास ₹1 इससे ज्यादा नहीं हो सकती।
लोहिया एक ऐसे राजनेता थे जिनसे जिनसे पेंटर्स इंस्पायर होते थे एम एफ हुसैन, स्वामीनाथन। जिनसे इंस्पायर होके लोगों ने नॉवेल लिखे यू आर अनंतमूर्ति, देवनुरू महादेव। जिनसे इंस्पायर होके हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कवितायें लिखी गयीं सर्वेश्वर दावल सक्सेना, रघुवीर सहाय। एक राजनेता जो इतना गहरा असर डाले समाज पे, फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास में गहरा असर है लोहिया का, वैसा राजनेता और चिंतक आज मिलता नहीं है।
जब भारत आज़ाद हुआ तो लोहिया क्या कर रहे थे, सारा देश जश्न मना रहा था वो हीरो थे पूरे देश के, जेल से निकले थे युवाओं के बिल्कुल सुपरस्टार थे लोहिया, वो दिल्ली में नहीं थे, वो गांधी के साथ बंगाल में दंगे शांत करा रहे थे। शायद ऐसे समय जब गांधी का साथ सबसे छोड़ दिया था। उनके प्रिय शिष्य अब कुर्सियां पर थे। तभी भारतीय इतिहास की एक चमत्कारी घटना हुई गांधी ने उपवास करके कलकत्ता में दंगे शांत करा लिए उस घटना की पृष्ठभूमि में लोहिया थे। लोहिया ने एक खूबसूरत वाक्य कहा था राजनीति अल्पकालिक धर्म है और धर्म पूर्णकालिक राजनीति, ये वाक्य शायद उनका पूरा राजनीतिक दर्शन बताता है। धर्म का यहाँ मतलब हिन्दू, मुश्लिम, सिख से नहीं, धर्म जोकि गहरा धर्म है। धर्म और राजनीति का ये गहरा रिश्ता जो गांधी ने भी बताया वो हमें है जो धर्म और राजनीति का छिछला रिश्ता आज बनाया जा रहा है उससे मुक्ति देता है।
दिक्कत ये हुई कि लोहिया के बारे मे दुष्प्रचार बहुत किया गया, लोहिया ऐसे पहले चिंतक थे, आज़ाद हिंदुस्तान में पहला इंसान था जिनसे नेहरू के खिलाफ खुल कर मोर्चा खोला और उस ज़माने के बुद्धिजीवी नेहरू पर उंगली उठाने की सोच भी नही सकते थे।
23 मार्च को भगत सिंह शहीद हुए थे और इसी तारीख को राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ था। पर उन्होंने कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया. क्योंकि उनके हिसाब से ये शहीदी दिवस था। भारत की राजनीति में राम मनोहर लोहिया को आखिरी चिंतक माना जा सकता है। उनके विचार हमेशा ही भारतीय राजनीति में अलग रहे थे।
वो जेपी की तरह राजनीति से अलग नहीं रहे थे. वो आजादी के बाद कांग्रेस की सरकार को हराने का 7 वर्षीय प्लान भी बना चुके थे. हालांकि, वो सफल नहीं हो पाया. उन्होंने नेहरू की नीतियों के खिलाफ जंग छेड़ी थी और इतने कद्दावर नेता के खिलाफ उन्हीं की लोकसभा फूलपुर से चुनाव भी लड़े. इरादा था कि नेहरू की गलतियां सबके सामने लाई जाएं.
1957 में जब लोहिया ने नेहरू के खिलाफ़ फूलपुर से चुनाव लड़ा तब नेहरू ने पत्र लिख कर लोहिया से पत्र लिख कर कहा की वो चुनाव प्रचार में नहीं आएंगे किन्तु जब देखा कि ना आने से वे चुनाव हार सकते है लोहिया ने बिना संसाधनों के भी इतना प्रचार कर लिया है तब नेहरू अपना वादा तोड़ते हुए प्रचार करने आये और चुनाव जीते भी पर फिर भी जो बूथ सड़क के किनारे थे जहाँ लोहिया प्रचार कर पाए वहाँ लोहिया नेहरू से भी आगे थे मतगणना में।
लोहिया के समाजवाद पर चढ़कर बहुत सारे नेता निकले थे. चौधरी चरण सिंह, मुलायम सिंह और बिहार के लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार सब लोग इनके ही गुण गाते थे. कहा जाता था कि लोहिया जिसके कंधे पर हाथ रख देते वो नेता बन जाता था.
भारत की नारी के बारे में लोहिया ने कहा था कि "इस देश की स्त्रियों का आदर्श सीता सावित्री नहीं द्रौपदी होना चाहिये, भारतीय नारी द्रौपदी जैसी हो, जिसने की कभी भी किसी पुरुष से दिमागी हार नहीं खाई. नारी को गठरी के समान नहीं बनाना है, परंतु नारी इतनी शक्तिशाली होनी चाहिए कि वक्त पर पुरुष को गठरी बना कर अपने साथ ले चले।आज के हिंदुस्तान में किसी औरत की निंदा तो करनी ही नहीं चाहिए. केवल जहां तक विचार का संबंध है उसमें भी, मैं समझता हूं बहुत संभल कर उसके बारे में कुछ बोलना चाहिए।"
लोहिया जानते थे कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में अंग्रेजी का प्रयोग आम जनता की प्रजातंत्र में शत प्रतिशत भागीदारी के रास्ते का रोड़ा है। उन्होंने इसे सामंती भाषा बताते हुए इसके प्रयोग के खतरों से बारंबार आगाह किया और बताया कि यह मजदूरों, किसानों और शारीरिक श्रम से जुड़े आम लोगों की भाषा नहीं है। उन्होंने लिखा:"यदि सरकारी और सार्वजनिक काम ऐसी भाषा में चलाये जाएं, जिसे देश के करोड़ों आदमी न समझ सकें, तो यह केवल एक प्रकार का जादू-टोना होगा।"
भारतीय राजनीति का बेबाक और बिंदास चेहरा रहे राममनोहर लोहिया ने ५० के दशक में ही भांप लिया था। उन्होंने लोकसभा में बल देकर अपनी बात रखते हुए कहा था, "अंग्रेजी को खत्म कर दिया जाए। मैं चाहता हूं कि अंग्रेजी का सार्वजनिक प्रयोग बंद हो, लोकभाषा के बिना लोक राज्य असंभव है। कुछ भी हो अंग्रेजी हटनी ही चाहिये, उसकी जगह कौन सी भाषाएं आती हैं यह प्रश्न नहीं है। हिन्दी और किसी भाषा के साथ आपके मन में जो आए सो करें, लेकिन अंग्रेजी तो हटना ही चाहिये और वह भी जल्दी। अंग्रेज गये तो अंग्रेजी चली जानी चाहिये।"
लोहिया ही थे जो राजनीति की गंदी गली में भी शुद्ध आचरण की बात करते थे। वे एकमात्र ऐसे राजनेता थे जिन्होंने अपनी पार्टी की सरकार से खुलेआम त्यागपत्र की मांग की, क्योंकि उस सरकार के शासन में आंदोलनकारियों पर गोली चलाई गई थी। ध्यान रहे स्वाधीन भारत में किसी भी राज्य में यह पहली गैर कांग्रेसी सरकार थी– ‘‘हिंदुस्तान की राजनीति में तब सफाई और भलाई आएगी जब किसी पार्टी के खराब काम की निंदा उसी पार्टी के लोग करें।....और मै यह याद दिला दूं कि मुझे यह कहने का हक है कि हम ही हिंदुस्तान में एक राजनीतिक पार्टी हैं जिन्होंने अपनी सरकार की भी निंदा की थी और सिर्फ निंदा ही नहीं की बल्कि एक मायने में उसको इतना तंग किया कि उसे हट जाना पड़ा।"






Comments

  1. बहुत अच्छी तरह से न शब्दबद्ध
    किया है।

    ReplyDelete
  2. Good work bro👍
    And thanks for writing a blog on him and making us aware about such great nation builders

    ReplyDelete
  3. Harshabh Singh Yadav25 April 2020 at 07:54

    Nicely written.....keep up the good work !!

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

फ़ैज़ की नज़्म "मुझसे पहली सी मुहब्बत"

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ( 1911-1984)  यकीनन अपनी पीढ़ी के सबसे बड़े उर्दू के शायर , इनका जन्म  13  फ़रवरी को हुआ यानी वैलेंटाइन वीक में  Kiss Day  के दिन ,  उनके जन्मदिन के एक ही दिन बाद प्रेमियों का सबसे बड़ा त्यौहार भी है. वैलेंटाइन डे. और क्या ही इत्तेफाक है कि फैज़ की एक नज़्म को आशिक ,  प्रेमी ,  लवर्स खूब यूज़ करते हैं. आमतौर पर हर समय ही और खासतौर पर इस इश्क के मौसम में. इन फैक्ट वो पूरी नज़्म नहीं ,  नज़्म की एक लाइन भर का उपयोग अपने प्रेम की इंटेंसिटी दर्शाने के लिए करते हैं. और वो लाइन है – मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग. होने को जो कोई भी इसे इस तरह यूज़ करता है वो प्रेम के लिए नहीं वियोग  के लिए मिलन के लिए नहीं वस्ल के लिए लव के लिए नहीं सेपरेशन के लिए इसे यूज़ करता है. और इस इकलौती लाइन को सुनकर लगता है कि, यकीनन रोमांस के ‘जुदाई’ वाले डाइमेंशन को कितने डीप में जाकर देखती है ये. लेकिन क्या हम सही हैं, जब हम कहते हैं –  मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग. दरअसल नहीं. क्यूंकि नज़्म के इंकलाबी अर्थ थे. पर दिलच...

The Mystery of Subhas Chandra Bose's Death in Plane Crash

भारत की स्वतंत्रता के लिए आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व करने वाले सुभाष चंद्र बोस की मौत एक बनी हुई है। हाल में इस मुद्दे पर फिर राजनीतिक हलकों और बुद्धिजीवियों के बीच तीखी बहस छिड़ रही है। आख़िर 'नेताजी' सुभाष बोस किन परिस्थियां में ग़ायब हुए या फिर उनकी मौत हुई? क्यों कई जाने-माने लोग उनकी मौत की ख़बर पर भरोसा नहीं करते? नेताजी सुभाष बोस से संबंधित इन्ही मुद्दों पर है इस बार की विवेचना। ज़ियाउद्दीन ने इंटेलिजेंस को चकमा दिया अठारह जनवरी, 1941, रात एक बज कर पैंतीस मिनट पर 38/2, एलगिन रोड, कोलकाता पर एक जर्मन वांडरर कार आ कर रुकी। कार का नंबर था BLA 7169। लंबी शेरवानी, ढीली सलवार और सोने की कमानी वाला चश्मा पहने बीमा एजेंट मोहम्मद ज़ियाउद्दीन ने कार का पिछला दरवाज़ा खोला। ड्राइवर की सीट पर उनके भतीजे बैठे हुए थे। उन्होंने जानबूझ कर अपने कमरे की लाइट बंद नहीं की। चंद घंटों में वो गहरी नींद में सोए कोलकाता की सीमा पार कर चंदरनागोर की तरफ़ बढ़ निकले। वहाँ भी उन्होंने अपनी कार नहीं रोकी। वो धनबाद के पास गोमो स्टेशन पर रुके। उनींदी आँखों वाले एक कुली ने ज़ियाउद्दीन का सामान...

RSS : Inside Stories of World's Biggest Volunteer Organization

20 जून , 1940 का दिन था. एक कमरे में एक डॉक्टर और एक प्रफेसर थे. दोनों ही पेशे के लिहाज से पूर्व. डॉक्टर बुजुर्ग , प्रफेसर अपेक्षाकृत जवान. डॉक्टर बहुत बीमार थे. उन्होंने अपने कांपते हाथों से जवान को एक चिट्ठी पकड़ाई. क्या लिखा था इसमें. “ इससे पहले कि तुम मेरे शरीर को डॉक्टरों के हवाले करो , मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि अब से संगठन को चलाने की पूरी ज़िम्मेदारी तुम्हारी होगी.” अगले रोज यानी 21 जून को डॉक्टर की मौत हो गई. डॉक्टर केशवराम बलिराम हेडगेवार की मौत हो गई. और उनके बाद संगठन यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख , या संघ की भाषा में कहें तो सरसंघचालक बने माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर. संघ की भाषा में कहें , तो गुरुजी. मगर उत्तराधिकारी चुनना इतना आसान था क्या डॉक्टर जी के लिए. ये सिलसिला इस घटना से तीन दशक पहले शुरू होता है. महाराष्ट्र के केशव बंगाल में डॉक्टरी पढ़ते-पढ़ते अरबिंद घोष के क्रांतिकारी विचारों के तले पलने वाली अनुशीलन समिति के सदस्य बने. फिर डॉक्टर बनकर नागपुर लौटे , तो कांग्रेस में सक्रिय हो गए. कांग्रेस के 1920 के नागपुर अधिवेशन के दौरान उन्हें संगठन बनाने का ...