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APJ Abdul Kalam: Inside Story of His Presidential Election

आज बारी है देश के 11वें राष्ट्रपति जनता के राष्ट्रपति भारत रत्न डॉ० ऐ०पी०जे० अब्दुल कलाम की। राष्ट्रपति का पद ख़ासा राजनैतिक होता है एक जमाना था जब शिक्षाविद या दार्शनिक राष्ट्रपति हुआ करते थे पर वो समय बीते अब दशकों हो गए थे, फिर एक वैज्ञानिक इस पद पर कैसे पहुंच गया। कलाम के नाम का चुनाव ख़ासा नाट्कीय है। 

इस नाटक का पहला अंक खेला गया राजधानी दिल्ली में 5 जून 2002 को, जब BJP की उस कमेटी की मीटिंग हुई जिसे तय करना था NDA की तरफ से राष्ट्रपति पद के लिए किसका नाम नामित किया जाएगा, इस मीटिंग में अटल – आडवाणी के अलावा जॉर्ज फर्नांडिस, वेंकैया नायडू और प्रमोद महाजन भी थे। इस मीटिंग में 5 नामों पर चर्चा हुई महाराष्ट्र के गवर्नर पी०सी० एलेग्जेंडर, उस वक़्त के उपराष्ट्रपति कृष्णकांत, कानूनविद् एम०एल० सिंघवी, इसके अलावा 2 नाम और थे पूर्व रक्षामंत्री के०सी० पंत और आख़िरी नाम ऐ०पी०जे० अब्दुल कलाम। कलाम का नाम इस नेताओं की लिस्ट में कैसे आगया इसका किस्सा भी काफ़ी रोचक है। दिल्ली में वैज्ञानिकों की एक कॉन्फ्रेंस चल रही थी जून का पहला सप्ताह और उसके भी शुरुआती पहले 2 दिन, इसमें सरकार की नुमाइंदगी करने पहुंचे तत्कालीन संसदीयकार्य मंत्री प्रमोद महाजन, कॉन्फ्रेंस के बाद चाय पान का दौर शुरू हुआ और तब प्रमोद महाजन ने वैज्ञानिकों से पूँछ की अगर आपकी मानी जाए तो राष्ट्रपति किसे होना चाहिये और सबका एक स्वर में जवाब था ऐ०पी०जे० अब्दुल कलाम, जो 1992 से 1999 तक अगल अगल प्रधानमंत्रीयों के कार्यालय में देश के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार रहे। लेकिन कलाम का नाम सबसे पहले प्रमोद महाजन ने नहीं कभी रक्षामंत्री रहे उस वक़्त के सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने लिया था। उस वाकिये को पढ़ने से पहले उस वक़्त के सियासी गणित को जान लिजिये। 1999 के चुनाव में 182 सीटों के साथ बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। 14 पार्टियों वाले गठबंधन NDA को कुल 270 सीटें मिली थी चंद्रबाबू नायडू की तेलगुदेशम पार्टी के 30 सांसद थे जो सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे थे। उधर कांग्रेस महज़ 114 सीटों पर सिमट गई थी। लेफ्ट फ्रेंट के पास भी 42 सीटें थी। अटल बिहारी वाजपेयी की बात करें तो उनके पास लोकसभा में ही 55% बहुमत था पर राष्ट्रपति का चुनाव में राज्यसभा से साथ साथ राज्यों के विधायक भी होते है और अटल बिहारी वाजपेयी जो कुछ महीने पहले ही सिर्फ़ 1 वोट से सत्ता गंवा चुके थे वो कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे। अटल जी ने भी कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों की तरह सर्वसम्मति का राग अलापना शुरू कर दिया। विपक्षी नेताओं के साथ मीटिंग होने लगीं। ऐसी ही एक मीटिंग 6 जून को दिल्ली में हुई जिसमें मुलायम सिंह यादव ने ऐ०पी०जे० अब्दुल कलाम का नाम प्रस्तावित किया लेकिन तबतक NDA के ज्यादातर दल बीजेपी के सुझाये नाम पी०सी० एलेग्जेंडर के नाम पर सहमत हो चुके थे इसलिए मुलायम सिंह इस राय को उस समय कोई ख़ास तब्बजो नहीं दी गयी। 6 जून 2002 लाल कृष्ण आडवाणी के घर पर एक लंच पार्टी हुई मेहमान थे प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, तेलगुदेशम के सुप्रीमो और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और वाजपेयी के ख़ास प्रमोद महाजन। प्रमोद महाजन ने चन्द्रबाबू नायडू को बताया NDA के सारे घटकदल पी०सी० एलेग्जेंडर के नाम पर सहमत हो गए हैं। पी०सी० एलेग्जेंडर को 1993 से लगातार महाराष्ट्र के गवर्नर थे। 1993 में मुंबई दंगों पर श्रीकृष्ण कॉमिशन की रिपोर्ट आई थी और 1995 में आया था महाराष्ट्र में शिवसेना और भाजपा युति का पहला शासन आया था। इसके बावजूद पी०सी० एलेग्जेंडर ने कॉमिशन की रिपोर्ट को लेकर ज्यादा है हाय-तौबा नहीं मचाई, शिवसेना इस वज़ह से उनको ख़ासा पसंद करती थी उधर गुजरात के दंगों के बाद बीजेपी अल्पसंख्यकों के एक नया राजनैतिक संदेश देना चाहती थी, वह चाहती थी कि अल्पसंख्यक समुदाय के एक व्यक्ति को देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंचाया जाए, जिसके लिए प्रमोद महाजन तमाम दलीलें दे रहे थे चन्द्रबाबू नायडू को। लेक़िन नायडू ने पी०सी० एलेग्जेंडर के नाम पर वीटो कर दिया क्योंकि उनको याद आ रही थी 18 बरस पुरानी सियासी दुश्मनी, दुश्मनी जिसका एक अंक खेल गया 1984 में हैदराबाद और दिल्ली के बीच। हैदराबाद में कांग्रेस के राज्यपाल थे रामलाल जिन्होंने उनके राजनैतिक गुरु और ससुर एन०टी० रामाराव की प्रचंड बहुमत से 1 बरस पहले चुन कर आई सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया था और रामाराव के बाग़ी भास्करराव को मुख्यमंत्री की शपथ दिलवादी जबकि उनके पास विधयकों का बहुमत भी नहीं था। बाद में कांग्रेस की हाराकीरी हुई। नायडू को ये लगता था इस सब के पीछे उस वक़्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के प्रधानसचिव पी०सी० एलेग्जेंडर का दिमाग काम कर रहा था और ऐसे में उनका वीटो करना लाज़मी था और वीटो करने के साथ-साथ चंद्रबाबू ने एक नाम काउंटर करने के लिए आगे बढ़ाया और ये नाम था तत्कालीन उपराष्ट्रपति कृष्णकांत का। आपको ये याद रखना होगा कि भले ही चन्द्रबाबू नायडू अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले NDA के साथ आगये थे और इससे पहले की उनकी पार्टी की 1.5 दशक की पॉलिटिक्स समाजवादी दलों के साथ, जनता दल के खेमे के साथ डेवेलप हुई थी ऐसे में कृष्णकांत के प्रति उनका राग स्वाभाविक था।1997 में संयुक्त मोर्चा की सरकार थी जिसका टीडीपी भी हिस्सा थी उसकी के दौरान कृष्णकांत को उपराष्ट्रपति चुना गया था। पर कृष्णकांत के नाम पर कट्टर भाजपाई सहमत नहीं हो पा रहे थे। उन्हें याद आरहा था 1978 का वो प्रसंग जब मोरारजी देसाई की जनता पार्टी की सरकार में समाजवादी धड़ा जनसंघ के मंत्रियों पर दोहरी सदस्यता को लेकर उंगली उठा रहा था इस धड़े का नेतृत्व मधु लिमये कर रहे थे और उनके एक मुखर समर्थक थे कृष्णकांत। यही कृष्णकांत अब चाहते थे उस वक़्त के जनसंघ और अब के भाजपा के नेता उनके नाम पर लामबंद हो जाएं। गतिरोध खत्म करने के लिए मीटिंग में अंत में ये निर्णय हुआ इन नामों पर घटक दलों के साथ विचार विमर्श कर लिया जाए।
7 जून 2002 इस दिन चयन समिति की मीटिंग प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के आवास पर हो रही थी। मीटिंग शुरू हुई और सब जॉर्ज फ़र्नान्डिस की तरफ देखने लगे, NDA के कन्वीनर जो पिछली रात से कृष्णकांत के नाम पर घटक दलों से बात कर रहे थे। जार्ज ने बताया कृष्णकांत के नाम पर कोई सहमत नहीं हो रहा है और शिवसेना ने तो यहाँ तक कह दिया है कि यदि भाजपा ने कृष्णकांत के नाम पर ज़ोर डाला तो वह गठबंधन से हट जाएगी। ऐसे में यह तय पाया गया कि पी०सी० एलेग्जेंडर के नाम को ही NDA की तरफ से तय माना जाए, चंद्रबाबू नायडू को भी बता दिया गया कि अब कोई चारा नहीं है। तय हुआ कि उस रात ही नाम का ऐलान हो पर नायडू ने कहा मैं इस बात पर सहमत हूं पर मुझे एक दिन का वक़्त दे दीजिये। बीजेपी ने यहीं पर रणनीतिक गलती कर दी थी। नायडू ने तो 24 घंटे का वक़्त ले लिया था पर अटल और आडवाणी ने धैर्य नहीं रखा उन्होंने पी०सी० एलेग्जेंडर को फ़ोन करके बधाई दे दी। पर वे ऐसे एकलौता दावेदार नहीं थे जिन्हें वक़्त से पहले बधाई दे दी गयी हो।
8 जून की सुबह जब अटल बिहारी को पी०सी० एलेग्जेंडर के नाम का ऐलान करना था, तब एक आदमी की ढूढाई चल रही थी दिल्ली में और वो आदमी था चन्द्रबाबू नायडू। वाजपेयी चाहते थे एक साथ सभी NDA के घटक दल नाम का ऐलान करें, एकता का प्रदर्शन हो। लगातार चन्द्रबाबू को फोन किये जा रहे थे पर उन्होंने हैदराबाद में किसी का भी फोन रिसिव करने से माना कर दिया था। ऐसे में बीजेपी ने अपने प्लान B को एक्टिव कर दिया और उसके लिए वाजपेयी के प्रधानसचिव ब्रजेश मिश्र मिले कांग्रेस नेता और सोनिया गांधी के करीबी नटवर सिंह से बातों बातों में ब्रजेश मिश्र ने कहा हम तो पी०सी० एलेग्जेंडर का नाम चाहते थे पर चंद्रबाबू नायडू के दबाव में कृष्णकांत के नाम पर सहमति बन गयी है। नटवर सिंह ने फौरन अपने कांग्रेसी आकाओं के इस बदले हुए घटनाक्रम के बारे में इकतिला दी। उधर कृष्णकांत को भी इसकी भनक लग गयी और उन्हों ने चन्द्रबाबू नायडू को समर्थन के लिए शुक्रिया कह दिया।
पर इस कहानी में तीसरा और आखरी ट्विस्ट आना अभी बाकी था, अभी बाक़ी थी एक और फ़ोन कॉल। 8 जून 2002 की शाम अभी बीती नहीं थी। एक बार फिर जमावड़ा लगा और इस बार अड्डा बना पृथ्वीराज रोड पर स्थित देश के गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी का आवास। उनसे मिलने पहुंचे वेंकैया नायडू, जॉर्ज फर्नांडिस और प्रमोद महाजन। सबको इस बात का इलहाम था कि वक़्त तेज़ी से निकलता चला जा रहा है और सभी विकल्पों पर विचार किया गया। और तब प्रमोद महाजन ने ऐ० पी० जे० अब्दुल कलाम का नाम आगे बढ़ाया, जॉर्ज फ़र्नान्डिस ने तुरंत बाकी घटक दलों से इस पर सहमति ली और फौरन वे निकले 7 रेस कोर्स रोड प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी को इस लेटेस्ट पॉलिटिकल डेवलोपमेन्ट के बारे में बताने। वाजपेयी भी ऐ०पी०जे० कलाम के नाम पर मुदित हो गए। आख़री कांटा अभी बाक़ी था जो बचा था रास्ते से निकालने को। चन्द्रबाबू नायडू को फ़ोन किया गया ये कहा गया हम तो कृष्णकांत के नाम पर सहमत है पर बीजेपी के अलावा और को बड़ा घटक दल इस नाम पर सहमत नहीं हो पा रहा है। आपका पी०सी० एलेग्जेंडर के नाम पर रिज़र्वेशन हैं उसे स्वीकार कर लिया गया है अब आप भी इस नाम पर सहमत हो जाइए। नायडू ने इक़रार कर दिया और ये तय हो गया NDA की तरफ से 11वें राष्ट्रपति के चुनाव के लिए जो उम्मीदवार होगा वो होगा ऐ०पी०जे० अब्दुल कलाम। सबसे राय लेली गयी थी क्या कलाम से पूंछा गया था, मैंने आपसे एक फ़ोन कॉल का ज़िक्र किया था, उस फ़ोन कॉल की, तीसरे बधाई वाले फ़ोन कॉल की बारी अब आने वाली थी।

रामेश्वरम के मछुआरे का बेटा जो अपनी मेधा के दम पर पहले DRDO का प्रमुख रहे और फिर 7 वर्ष तक देश का वैज्ञानिक सलाहकार। ऐ०पी०जे० अब्दुल कलाम सन 1999 में अपनी सरकारी जिम्मेदारियों से निवृत्त होकर अपने फेवरेट काम अध्यापन की तरफ़ लौट आये थे। 2002 में वे अन्ना मलय यूनिवर्सिटी में रोज़ की तरह अपना लेक्चर ले रहे थे। लेक्चर क्या होता था, एक जलसा सा होता था 60 स्टूडेंट्स की क्लास में 350 से ज़्यादा स्टूडेंट्स मौजूद रहते थे। ऐसी ही एक क्लास खत्म कर लांच से फ़ारिग हो अगली क्लास के नोट्स देख रहे थे अब्दुल कलाम तब उनके पास पहुंचे उस विश्वविद्यालय के वीसी डॉ० ऐ० कलानिधि और बोले के आपके दफ़्तर का फ़ोन पिछले 2 घंटे से लगातार बज रहा है बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री आपसे बात करना चाहते हैं। कलाम ने इस वाकये को ख़ुद अपने शब्दों में दर्ज़ किया है। कलाम फ़ोन के पास पहुंचे बताया गया प्रधानमंत्री जल्द ही लाइन पर आएंगे, लेकिन तबतक उनका मोबाइल फोन बज उठा, उसपर लाइन के थे आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू उन्होंने बस इतना कह प्रधानमंत्री को आपसे कुछ बहुत जरूरी बात करनी है आप प्लीज ना मत कहियेगा। कलाम को समझ नहीं आया ऐसी कौनसी चीज़ है जिसके लिए उनको ना नहीं कहना चाहिए। तब तक फ़ोन पर अटल बिहारी वाजपेयी की ठहरी हुई आवाज गूंजने लगी थी। क्या बातचीत हुई कलाम और वाजपेयी के बीच खुद कलाम के शब्दों में जानते हैं मुझसे अटल बिहारी वाजपेयी ने पूछा कैसा चल रहा है पढ़ाई लिखाई का काम? मैं बोला बहुत अच्छा। इसके बाद प्रधानमंत्री बोले हमारे पास आपके लिए एक अहम संदेश है मैं अभी अभी गठबंधन में शामिल नेताओं की बैठक से निकला हूँ हमने सर्वसम्मति से फैसला किया है कि देश को राष्ट्रपति के रूप में आपकी जरूरत है। मुझे आज रात ही इसका ऐलान करना है, मुझे आपकी सहमति चाहिए। दिखिए मुझे आपसे सिर्फ हाँ सुनना है ना मत कहियेगा। कलाम ने अटल के इस प्रस्ताव पर विचार करने के लिए 2 घंटे का समय माँगा और फिर हामी भर दी। 10 जून को NDA की तरफ से ऐ०पी०जे० अब्दुल कलाम के नाम का ऐलान हुआ। सपा तो जैसे इसका इंतेज़ार कर रही थी फौरन समर्थन का ऐलान कर दिया। कांग्रेस पसोपेश में थी उसको पहले तो लग रहा था पी०सी० एलेग्जेंडर लंबे वक़्त तक गांधी परिवार से ख़ास रहे हैं तो उस नाम पर दिक्कत नहीं होगी, लेक़िन वो क़लाम के नाम के भी मुख़ालफ़त नहीं कर सके। लेक़िन किसी न किसी को तो विरोध करना था, लोकतंत्र इसी विविधता का विरोध और समर्थन का नाम है। विरोध किया लेफ्ट पार्टियों ने उन्होंने बोला कालम ने मिसाइलें बनाई है, बम बनाये है और ये हमारे दर्शन के खिलाफ है और ऐसे में कलाम के ख़िलाफ़ सांकेतिक लड़ाई के लिये ही सही वो लेकर आये कैप्टन लक्ष्मी सहगल को, जो कानपुर में बतौर डॉक्टर गरीबों की सेवा कर रहीं थी, वे आज़ाद हिंद फौज का हिस्सा रहीं थी।
18 जुलाई 2002 को देश के 11वें राष्ट्रपति के लिए हुए चुनाव के नतीज़ों का ऐलान हुआ NDA के उम्मीदवार ऐ०पी०जे० अब्दुल कलाम को मिले 9,22,884 मूल्य के वोट, लक्ष्मी सहगल को मिले 1,60,366 मूल्य के वोट। और इस तरह ऐ०पी०जे० अब्दुल कलाम, चचा कलाम देश के 11वें राष्ट्रपति बन गए।
कैसा रहा राष्ट्रपति के तौर पर उनका कार्यकाल? लोगों की नज़रे उनके पहले गुजरात दौरे पर थी, लेकिन उन्होंने गुजरात दौरे पर किसी बहुत ज्यादा राजनैतिक निहितार्थ वाले बयान को देने से परहेज किया और अनुसंधान पर जोर दिया। 2 बरस बाद लोकसभा के चुनाव हुए, तमाम सर्वेक्षणों को धता बताते हुए NDA की हार हुई और UPA के कुनबे को लेफ्ट के सहारे सत्ता नज़र आने लगी और तब एक बड़ा प्रसंग खेला गया दिल्ली में। कांग्रेस और उसको समर्थन देने वाले दलों को लग रहा था नई सरकार की सदारत सोनिया गांधी करेंगी। सोनिया गांधी राष्ट्रपति अब्दुल कलाम से मिलीं और फिर कांग्रेस संसदीय दल की मीटिंग में उन्होंने नाटकीय ढंग से ऐलान किया कि मैं इस पद पर नहीं बैठूंगी साथ में उन्होंने मनमोहन सिंह के नाम का ऐलान किया। उसके बाद से अब तक दिल्ली में कई कॉन्सपिरेसी थेओरिस घूमती हैं कुछ कहते हैं कि कलाम ने सोनिया को शपथ दिलवाने से इनकार कर दिया था, कोई संविधान की ओठ में कुछ साजिशें बुनता है। खुद कलाम ने असरे बाद इस पर चुप्पी तोड़ी और ये कहा सोनिया गांधी के परिवार के लोग, उनके बेटे और बेटी ये नहीं चाहते थे कि मम्मी इस पद पर बैठे, वो अपनी दादी और आपने पिता को खो चुके थे ये पूरी तरह से पारिवारिक मामला था, और राष्ट्रपति के किसी भी कथित दबाव या सलाह का इसमें कोई रोल नहीं था।
कलाम का कार्यकाल जब राष्ट्रपति भवन को छात्रों के लिए खोल दिया गया और राष्ट्रपति अपने भवन के दरवाजों से निकल कर पूरे देश में पहुंचा, सबसे ज्यादा विद्यार्थियों के पास पहुंचा। राष्ट्रपति कलाम सादगी का प्रतीक और ये सादगी उनके पद छोड़ने के बाद भी उनके साथ बनी रही और इसका सबसे सुंदर सबसे प्रेरणादायी उदाहरण उनकी बची हुई चीजों से मिलता है। चीजें जिन्हें सामने लगाया IIM शिलॉन्ग में एक लेक्चर के दौरान उनकी मौत के बाद।
27 जुलाई 2015 को प्रोफेसर कलाम IIM शिलॉन्ग में लेक्चर दे रहे थे, तभी उनकी तबियत खराब हुई और मौके पर ही उन्होंने दम तोड़ दिया।

10 राजाजी मार्ग पर रहा करते थे कलाम रिटायरमेंट के बाद नए बंगले में मूव करने से पागल पूर्व राष्ट्रपति से पूंछा जाता है इस बंगले में क्या बदलाव किए जाएं आपकी सहूलियतों के लिए। कलाम ने सिर्फ एक मांग की थी एक अच्छी क्षमता वाला सर्वर लगा दिया जाए जिससे कि इंटरनेट की स्पीड अच्छी रहे। अब कलाम के पास अपना कहने को क्या था जिसका की मैंने पहले जिक़्र किया एक सूची पढ़ कर बताता हूँ आपको कुल 2.5 हजार किताबें, एक हाथ की घड़ी, 6 शर्ट्स, 4 ट्राउज़र्स और एक जोड़ी जूते। घर में कोई टीवी नहीं, कोई ऐसी नहीं, कोई फ्रिज नही, अपने नाम से कोई कर नहीं और अपना परिवार वो तो भारत परिवार था और इसी लिए कृतज्ञ राष्ट्र ऐ०पी०जे० अब्दुल कलाम को बहुत श्रद्धा के साथ याद करता है।

मेरे पिछले ब्लॉग के बाद कई शुभचिंतकों ने ऐ०पी०जे० अब्दुल कलाम पे ब्लॉग लिखने को कहा था, कलाम साहब के जीवन पर पहले से बहुत मटेरियल इंटरनेट पर उपलब्ध है पर उनके राष्ट्रपति बनने की इनसाइड स्टोरी बहुत कम लोगों को पता है तो मैंने इस ब्लॉग में वही इनसाइड स्टोरी लिखी है। ये मेरे सौभाग्य ही है की मैंने कलाम साहब को प्रत्यक्ष देखा है जब वे 2009 में मेरे स्कूल आये थे। आप सभी का रेगुलर फीडबैक चाहूंगा ब्लॉग को और इम्प्रूव करने की लिए। थैंक्यू फ़ॉर रीडिंग।

Comments

  1. such a amazing post i loved it.
    great work brother

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  2. As always Utkarsh .... nicely written 👌👌

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  3. 🙏🙏🙏
    Thank you for writing a blog oh him..
    Loved it.

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