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Showing posts from June, 2020

P. V. Narasimha Rao : King of Backstage in Indian Politics

कभी यूं भी तो हो कि इस देश की तारीख़, तारीख़ों के मुताबिक़ लिखी जाए। 15 अगस्त 1947 देश ब्रिटिश राज से आज़ाद हुआ, एक और अहम तारीख़ है 24 जुलाई 1991, देश लाइसेंस परमिट राज से आज़ाद हुआ। 24 जुलाई के जिक़्र ख़ूब आता है कि, ख़ूब बताया जाता जाता है कि देश में आर्थिक उदारीकरण लाने वाला बज़ट उस वक़्त के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने पेश किया था। एक बात नहीं बताई जाती, जिस शाम मनमोहन ने वो बजट पेश किया उसी सुबह संसद के पटल पर नई Industrial Policy के documents भी पेश किए गए थे, जिसके बाद अब ये तय हो गया था भारत एक बाज़ार होगा जहाँ पर बिना किसी कठोर सरकारी नियंत्रण के एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होगी, लाइसेंस परमिट का राज़ नहीं होगा और निजी क्षेत्र फलेगा फूलेगा। ये सब मुमकिन हुआ नई Industrial Policy के चलते जिसे उस वक़्त के Industry प्रभार के राज्य मंत्री P.J. कुरियन के द्वारा पेश किए गए था। सवाल ये उठता है कि एक राज्य मंत्री ने इतनी महत्वपूर्ण घोषणा क्यों कि? ये मंत्रालय था किसके पास? ये मंत्रालय जिस शख्स के पास था आज बात उसी की, जिसे मैं नेपथ्य का नरेश(King of Backstage) कहता हूँ। राग शिवरंजनी सुनने वाला वो नेता ज...

RSS : Inside Stories of World's Biggest Volunteer Organization

20 जून , 1940 का दिन था. एक कमरे में एक डॉक्टर और एक प्रफेसर थे. दोनों ही पेशे के लिहाज से पूर्व. डॉक्टर बुजुर्ग , प्रफेसर अपेक्षाकृत जवान. डॉक्टर बहुत बीमार थे. उन्होंने अपने कांपते हाथों से जवान को एक चिट्ठी पकड़ाई. क्या लिखा था इसमें. “ इससे पहले कि तुम मेरे शरीर को डॉक्टरों के हवाले करो , मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि अब से संगठन को चलाने की पूरी ज़िम्मेदारी तुम्हारी होगी.” अगले रोज यानी 21 जून को डॉक्टर की मौत हो गई. डॉक्टर केशवराम बलिराम हेडगेवार की मौत हो गई. और उनके बाद संगठन यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख , या संघ की भाषा में कहें तो सरसंघचालक बने माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर. संघ की भाषा में कहें , तो गुरुजी. मगर उत्तराधिकारी चुनना इतना आसान था क्या डॉक्टर जी के लिए. ये सिलसिला इस घटना से तीन दशक पहले शुरू होता है. महाराष्ट्र के केशव बंगाल में डॉक्टरी पढ़ते-पढ़ते अरबिंद घोष के क्रांतिकारी विचारों के तले पलने वाली अनुशीलन समिति के सदस्य बने. फिर डॉक्टर बनकर नागपुर लौटे , तो कांग्रेस में सक्रिय हो गए. कांग्रेस के 1920 के नागपुर अधिवेशन के दौरान उन्हें संगठन बनाने का ...

Karna: The Most Underestimated Warrior of Mahabharat

Karna, a warrior seen by many with an empathetic view who suffered from all possible misfortunes and was disgraced at every possible doorstep of his life is an epitome of what persistent efforts can win for a person. He is not bound by the clutches of time and people still wonder whether he was better than Arjuna himself? Karna, who was insulted by Draupadi during her Swayamvar by refusing him because of his birth cast even when he was about to win the competition and at time of Cheerharan Draupadi reasiled that if she hadn't humiliated Karna by refusing him, he might save her. Abandoned at an early age by his mother due to societal pressure and being brought up by a family of chariot driver, he felt the heat of the society whenever he attempted to desire beyond his social limitations. Despite his talent and hard work, he failed to gain teachings of archery from great scholars of that time and was rather humiliated by the society. His identity of belonging to the lower class confro...