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P. V. Narasimha Rao : King of Backstage in Indian Politics



कभी यूं भी तो हो कि इस देश की तारीख़, तारीख़ों के मुताबिक़ लिखी जाए।
15 अगस्त 1947 देश ब्रिटिश राज से आज़ाद हुआ, एक और अहम तारीख़ है 24 जुलाई 1991, देश लाइसेंस परमिट राज से आज़ाद हुआ। 24 जुलाई के जिक़्र ख़ूब आता है कि, ख़ूब बताया जाता जाता है कि देश में आर्थिक उदारीकरण लाने वाला बज़ट उस वक़्त के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने पेश किया था। एक बात नहीं बताई जाती, जिस शाम मनमोहन ने वो बजट पेश किया उसी सुबह संसद के पटल पर नई Industrial Policy के documents भी पेश किए गए थे, जिसके बाद अब ये तय हो गया था भारत एक बाज़ार होगा जहाँ पर बिना किसी कठोर सरकारी नियंत्रण के एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होगी, लाइसेंस परमिट का राज़ नहीं होगा और निजी क्षेत्र फलेगा फूलेगा। ये सब मुमकिन हुआ नई Industrial Policy के चलते जिसे उस वक़्त के Industry प्रभार के राज्य मंत्री P.J. कुरियन के द्वारा पेश किए गए था। सवाल ये उठता है कि एक राज्य मंत्री ने इतनी महत्वपूर्ण घोषणा क्यों कि? ये मंत्रालय था किसके पास? ये मंत्रालय जिस शख्स के पास था आज बात उसी की, जिसे मैं नेपथ्य का नरेश(King of Backstage) कहता हूँ। राग शिवरंजनी सुनने वाला वो नेता जो रिटायरमेंट की तैयारियां कर रहा था और इस लिए उसने 1991 का लोकसभा चुनाव भी नहीं लड़ा था। लेकिन एक तारीख़ फिर आयी 21 मई 1991 तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में देश की पूर्व प्रधानमंत्री और उस वक़्त के कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी की लिट्टे की आत्मघाती दस्ते ने हत्या कर दी। इसके बाद पहले कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और फिर इसके संसदीय दल के नेता का ताज सज़ा P. V. नरसिम्हा राव के सिर पर जिनकी पैदाइश आज के ही दिन की 100 साल पहले की है, तारीख़ के हिस्से में नाम था 28 जून 1920।
नेपथ्य नरेश P. V. नरसिम्हा राव 24 जुलाई 1991 को देश के Industry minister थे फिर भी उन्होंने ये एतिहासिक मौका अपने जूनियर मंत्री P. J. कुरियन, जो बाद में राज्यसभा के उपसभापति भी बने और P. V. नरसिम्हा राव देश को उदारीकरण के रास्ते पर ले जाने वाले, एक ब्यूरोक्रेट् मनमोहन सिंह को सारी राजनैतिक पूँजी, ताक़त और बैकिंग मुहिया करने वाले P. V. नरसिम्हा राव पहले ऐसे ग़ैर गांधी नेता जिन्होनें बतौर प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा किया, देश के ऐसे एकलौते प्रधानमंत्री जिन्होंने जब प्रधानमंत्री का पद ग्रहण किया तब वे न तो लोकसभा के सदस्य थे ना ही राज्यसभा के और आखिर में क्या हुआ जब 23 दिसंबर 2004 को हार्ट अटैक के चलते जोकि 14 दिन पहले उन्हें पड़ा था, दिल्ली के AIIMS अस्पताल में उनका निधन हुआ तो कांग्रेस ने उनके साथ सौतेला व्यवहार किया। कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ये सुनिश्चित किया कि नरसिम्हा राव के पार्थिव शरीर को पार्टी मुख्यालय ना लाया जाए, जबकि उनके बेटे प्रभाकर राव बार बार मीडिया के सामने कहते रहे दिल्ली ही मेरे पिता की कर्मभूमि रही है।
70 के दशक की शुरुआत में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री का पद छोड़ने के बाद इसी दिल्ली में तो नरसिम्हा राव अपना रणनीतिक कौशल दिखाते रहे पहले इंदिरा गांधी के लिए, फिर राजीव गांधी के लिए और फिर खुद ही केंद्र में रहे लेकिन सीताराम केसरी के दांव के बाद वे नेपथ्य में चले गए और नेपथ्य से ही गुज़र गए।
उनके नाम को लेकर, उनके काम को लेकर ये देश कब बात करेगा, कब तक हम कांग्रेस की शक्ल देखते रहेंगे नरसिम्हा राव को याद करने के लिए, क्या हम भी मनमोहन सिंह की तरह बेबस हैं जो 10 साल देश का प्रधानमंत्री रहने के बावजूद अपने राजनैतिक गुरु को भारत रत्न नहीं दिला पाए।
हमें और आपको तय करना है, इतिहास समुच्चय का नाम है, कुल जमा ग़लतियो और उपलब्धियों का और मुझे अपनी सीमित राजनैतिक समझ के साथ यक़ीनी तौर पे ये लगता है कि P. V. नरसिम्हा राव इस देश के रत्न हैं और उनको मरणोपरान्त ही सही ये हक़ मिलना चाहिए।

Comments

  1. Woo,the man who got the highest no. Of lok sabha votes for the very first time!!Well done UTKARSH!!

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  2. Happy to learn that you are developing understanding of multiple areas of life.

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